Brahm Samaj ki Sthapna in Hindi

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Brahm Samaj ki Sthapna in Hindi

नमस्कार साथियों!

Brahm Samaj ki Sthapna

इम्पॉर्टन्टज्ञान के इस सीरीज में आप सभी का स्वागत है। आज हम एक नए टॉपिक के साथ आपको ज्ञान की बातें दिल से बताने आये हैं। आज का विषय है भारत में ब्रह्म समाज की स्थापना। इस लेख में हम आपको बताएँगे की ब्रह्म समाज की स्थापना कब और क्यों हुई। इसका उद्देश्य क्या था? आप इसके बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं तो मेरे साथ शुरू से अंत तक बने रहें। Brahm Samaj ki Sthapna

वैसे देखा जाय तो ब्रह्म समाज पर आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा का बहुत गहरा प्रभाव देखने को मिलता है और हिन्दू धर्म में पहला सुधार आंदोलन था। इस धर्म के प्रवर्तक राजा राम मोहन राय थे। उस दौर में इनका अपना स्थान था। ये बहुत विद्वान थे और इनको कई भाषाओँ जैसे अरबी, फारसी, संस्कृत और अंग्रेजी,फ्रांसीसी, लैटिन,यूनानी और इब्री जैसे पाश्चात्य भाषा पर अपनी एक अलग पकड़ थी।ये धर्म सुधार से बहुत प्रेम करते थे।Brahm Samaj ki Sthapna

वो दौर था जब कुछ युवा वर्ग पाश्चात्य शिक्षा से बहुत ही प्रभावित होकर बंगाली ईसाई धर्म की और अपना रुख कर रहे थे उसी समय राजा राम एक हिन्दू धर्म के रक्षक के रूप में दीवार बनकर खड़े हुए। जब पादरी पचारक हिन्दू धर्म पर अपने विचार थोपने का प्रयास किया तो इसका राजा राम मोहन जी ने हिन्दू धर्म की रक्षा किया और इसमें पनप रही झूठ और अन्धविश्वास को जड़ से हटाने का प्रयास भी किया। ये मूर्तिपूजा के बड़े विरोधी थे। और हिन्दू धर्म के सिद्धांतों की पुनर्व्याख्या भी किया और ईसाई तथा इशू के देवत्य की भावना को एक सिरे से अस्वीकार भी कर दिया। इसके लिए उन्होंने उपनिषद का भी सहारा लिया।  Brahm Samaj ki Sthapna

ये हमेशा से ही धर्म हो या समाज, उसमें फ़ैल रही तमाम बुराइयों और असंगति को कभी नहीं माना और उसका पुरजोर विरोध भी किया। ये समाज में फैली हुई बुराई जैसे -वेश्यागमन,बहुपत्नी प्रथा,सती प्रथा और जातिवाद को हमेशा बुराई की जड़ माने और समाज के विकास में एक बाधक तत्व। Brahm Samaj ki Sthapna

लेकिन राजा राम मोहन राय विधवापुनर्विवाह को मानते थे। ये पूर्व और पशिचम विचारधारा के सेतु के रूप में थे और आधुनिक भारत का अग्रदूत और देश के पथ प्रदर्शक कहे जाते हैं। Brahm Samaj ki Sthapna

इन्होने ने १८२८ में ब्रह्म समाज की नींव डाली लेकिन १८३३ में इंग्लॅण्ड में इनकी अकाल मृत्यु हो गयी।आगे चलकर देखा जाए तो इस ब्रह्म समाज में नए तरीके से प्राण देवेंद्र नाथ टैगोर ने फूंका। इस आंदोलन में टैगोर जी १८४२ में शामिल हुए। ये भी मूर्तिपूजा,तीर्थ यात्रा और कर्मकांड के बहुत बड़े विरोधी थे। इनका मानना था की एक साधक जिस रूप में चाहें ईश्वर की आराधना कर सकता है। लकड़ी या पाषाण को ईश्वर कैसे माना जा सकता है।Brahm Samaj ki Sthapna

देवेंद्र नाथ ने अपने बाद ब्रह्म समाज की बागडोर केशवचन्द्र सेन को दे दिया। ये भी उदारवादी विचारधारा से ओतप्रोत थे जिससे आंदोलन की नयी ऊर्जा और दिशा मिली। अब ब्रह्म समाज के शाखाओं का विस्तार हुआ और इसकी शाखाएं बंगाल से बाहर उप्र,पंजाब और मद्रास में खुलीं।  सबसे ज्यादा शाखाएं खुलीं बंगाल में १८६५ ईस्वी में। 

लेकिन आगे चलकर देखा गया की केशचन्द्र के उदारवादी विचारधारा ने ब्रह्म समाज में फुट डाल दिया। इनका कहना था की हिन्दू धर्म में संकीर्णता है। ये यज्ञोपवीत और संस्कृत के मूलपाठ के प्रयोग को सही नहीं मानते थे। इनकी सभावों में सर्व धर्म का पाठ होने लगा जैसे-ईसाई ,मुस्लमान, पारसी और चीनी। अब ये हिन्दू धर्म को एक नया धर्म सुधार आंदोलन मानने लगे। 

लेकिन १८६५ में देवेंद्र नाथ टैगोर ने इनको हिन्दू धर्म के आचार्य पद से हटा दिया। लेकिन केशव चंद्र सेन ने एक नए धर्म ‘नवीन ब्रह्म समाज की स्थापना किए जो ‘आदि ब्रह्म समाज कहलाया। इसमें उन्होंने स्त्रियों के लिए मुक्ति,विद्या प्रसार, सस्ते साहित्य का बटना, मद्यपान निषेध और दान दक्षिणा पर ज्यादा बल दिया।Brahm Samaj ki Sthapna

लेकिन देखा जाय तो आगे चलकर इस समाज में एक और फुट हुआ। फुट का कारण था ‘विवाह के लिए न्यूनतम आयु का विधान।’लेकिन विधान बनाने वाले ने ही खुद ही नियम का उल्लंघन कर अपनी १३ वर्षीया पुत्री का विवाह कूच के कम आयु के महाराजा से कर दिया। और कह दिया की ‘सब ईश्वर की आज्ञा है।’

इस बात से दुखी होकर इनके अनुयायी एक नए ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना कर दिए। Brahm Samaj ki Sthapna

ब्रह्म समाज ने अवतारवाद,बहुदेववाद,मूर्तिपूजा वर्णव्यस्था जैसे विचार धारा को अपने समाज में स्थान नहीं दिया और इसको त्याग दिया और धर्म ग्रंथों की श्रेणी को मानवीय अंतरात्मा और तर्क के ऊपर कभी नहीं माना।लेकिन कर्म और पुनर्जन्म की बातों को विवाद में न डालकर ब्रह्म समाजी को मानने और न मानने वालों के ऊपर ही छोड़ दिया। Brahm Samaj ki Sthapna 

ब्रह्म समाज ने बहु विवाह,बाल विवाह,पर्दा प्रथा और सती प्रथा को समाप्त करने का हमेशा प्रयास किया और साथ थी साथ ये लोग समाज से जातिवाद और अस्पृश्यता को भी हटाने के लिए पुरजोर कोशिश किये लेकिन इनको सफलता नहीं मिली। समाज सुधार के मामले में इनके कुछ चार प्रमुख उद्देश्य थे जैसे-जाति पाँति का विरोध,स्त्री और पुरुष के विवाह की आयु को बढ़ाना, विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा।Brahm Samaj ki Sthapna

 तो साथियों अब मेरी लेखनी को यहीं विराम दें की इजाजत दीजिये अगर आपके कोई सुझाव और कमेंट हो तो जरूर कमेंट बॉक्स  शेयर करें। धन्यवाद 

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FAQ

प्रश्न:- हिन्दू धर्म में पहला सुधार आंदोलन कौनसा था?

उत्तर:-हिन्दू धर्म में पहला सुधार आंदोलन “ब्रह्म समाज की स्थापना था”

प्रश्न:-ब्रह्म समाज के प्रवर्तक कौन थे? 

उत्तर:-ब्रह्म समाज के प्रवर्तक “राजा राम मोहन रॉय” थे।  

प्रश्न:-आधुनिक भारत का अग्रदूत और देश के पथ प्रदर्शक कौन थे?

उत्तर:-राजा राम मोहन रॉय थे। 

प्रश्न:-ब्रह्म समाज की स्थापना कब हुई थी? 

उत्तर:-राजा राम मोहन रॉय ने १८२८ में ब्रह्म समाज की नींव डाली।  

प्रश्न:-राजा राम मोहन रॉय की मृत्यु कब और कहाँ हुई थी? 

उत्तर:-राजा राम मोहन रॉय की १८३३ इंग्लॅण्ड में इनकी अकाल मृत्यु हो गयी। 

प्रश्न:-ब्रह्म समाज की सबसे ज्यादा शाखाएं कहाँ खुली?

उत्तर:-ब्रह्म समाज की सबसे ज्यादा शाखाएं खुलीं बंगाल में १८६५ ईस्वी में।


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