Mahatma budh ka Jeevan parichay

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Mahatma budh ka Jeevan parichay

mahatma budh ka jeevan parichay

नमस्कार साथियों!

इम्पोर्टैज्ञान ज्ञान के इस सीरीज में आप सभी का स्वागत है। आज हम बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध के बारे में चर्चा करेंगे। आप एक ऐसे युगपुरुष के बारे में पढ़ने जा रहे हैं जिसने संसार को मध्यम मार्ग का ज्ञान दिया और बौद्ध धर्म का प्रवर्तन किया। हम यहाँ उनका जीवन परिचय पढ़ेंगे और उनको कैसे ज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने संसार को कौनसा ज्ञान दिया इसका विस्तार से अध्यन करेंगे। 

गौतम बुद्ध:-

गौतम बुद्ध नास्तिक आचार्यों में सबसे महान थे इनका समय लगभग इसा पूर्व छठी शताब्दी था। ए ल बाशम ने तो यहाँ तक लिखा है की “यदि विश्व के ऊपर उनके मरणोत्तर प्रभावों के आधार पर उनका मुल्यांकन किया जाय तो वे भारत में जन्म लेने वाले महानतम व्यक्ति थे।” इनका प्रवर्तित धर्म आगे चलकर अन्तर्राष्ट्रीय धर्म बना। Mahatma budh ka Jeevan parichay

जन्म:- 

महात्मा बुद्ध का जन्म ५६३ ईसापूर्व के लगभग हुआ था। इनका जन्म स्थान लुम्बिनी था।यह कपिलवस्तु में पड़ता है।  कपिलवस्तु शाक्य कुल की राजधानी थी।आधुनिक में इस स्थान की पहचान रूमिनदेई(नेपाल की तराई) से की जाती है।लुम्बिनी को आमों का वन कहा जाता था।Mahatma budh ka Jeevan parichay

माता-पिता:- 

इनके पिता का नाम सुद्धोदन था और माता का नाम माया देवी था। इनके पिता कपिलवास्तु के शाक्य गण के प्रधान थे। इनकी माता कोलिय गण राज्य की कन्या थीं। बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था।सिद्धार्थ के जन्म के ७ दिन बाद ही इनकी माता का देहांत हो गया। इनका पालन पोषण विमाता प्रजापति गौतमी ने किया था।इसलिए इनका एक नाम ‘गौतमी’ भी था। 

भविष्य-वाणी:- 

इनकी शिक्षा-दीक्षा राजकुमारों के तरह हुआ था और काफी ठाठ-बाठ का  बचपन था। इनके बचपन के समय कालदेव और कौडिन्य नमक दो ब्राह्मणों ने कहा की ये या तो चक्रवर्ती राजा बनेगें या बहुत बड़े सन्यासी।ये बहुत चिंतन शील और एकांतप्रिय थे। इनका मन वैभव विलास में नहीं लगता था।बचपन से ही इनका मन संसार से विरक्त था। Mahatma budh ka Jeevan parichay

विवाह:- 

जब सिद्धार्थ १६ वर्ष के हुए तो इनकी शादी हुई। इनकी पत्नी का नाम यशोधरा था। यशोधरा शाक्य कुल से सम्बंधित थी।इनके कुछ अन्य नाम भी थे जैसे-बिम्बा,गोपा,भदकच्छना और कत्यानीं आदि। लेकिन सबसे लोकप्रिय नाम यशोधरा ही था। इनके पुत्र का नाम राहुल था। राहुल का अर्थ राहु यानि ‘बंधन’। Mahatma budh ka Jeevan parichay

प्रारंभिक घटना चक्र:- 

सिद्धार्थ के पिता ने इनके लिए यशो-आराम की सारी व्यवस्था कराये ताकि उनका पुत्र सांसारिक दुखों से दूर रहे। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है? इनको तो सन्यासी बनना था। इनका मन सांसारिक वस्तुओ में नहीं रमा। इन्होने ने चार ऐसे दृश्य देखे जिससे इनका पूरा जीवन चक्र ही बदल गया। Mahatma budh ka jeevan parichay

प्रथम दृश्य:-इसमें इनको सबसे पहले एक बृद्ध दिखाई दिया। 

दूसरा दृश्य:-इस बार इन्होने एक बृद्ध -रोगी को देखा। 

तीसरा दृश्य:-इस बार इन्होने एक मृत व्यक्ति को देखा जिसको कुछ लोग लेकर जा रहे थे। 

चौथा दृश्य:-इस बार इन्होने एक बहुत प्रसन्नचित सन्यासी को देखा। 

गृह त्याग:-

इन सभी के बारे में जानने के लिए अपने सारथि चांदकया चाड से पूछा। उसने विस्तार से इसका मतलब बताया और कहा की सबको एक दिन यही गति मिलनी है और यही जीवन की असली सच्चाई है जिसको बदला नहीं जा सकता।यह सब सुनकर और देखकर सिद्धार्थ बिलकुल अंदर से बदल चुके थे और कोई भी लालसा या जीवन का आकर्षण इनको बांध नहीं सकता था।

ये २९ वर्ष की अवस्था में अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़कर घर त्याग दिया। इनके प्रिय घोड़े का  नाम कंथक था। इस गृह त्याग को बौद्ध गृन्थ में ‘महाभिनिष्क्रमण‘  कहा जाता है। महात्मा बुद्ध के गृह त्याग का प्रतिक अश्व था।

भ्रमण:-

सिद्धार्थ जब घर से निकले तो इसके बाद वो अमोना नदी के तट पर आये और वे यहाँ अपना बाल मुंडवाए और कसाय वस्त्र(गेरुआ वस्त्र) धारण किये और अनुपिय नामका बगीचे में पहुँच गए। इसके बाद ये ‘आलार कलाम’ के आश्रम में पहुंचे। इनका आश्रम वैशाली के पास था और ये सांख्य दर्शन के आचार्य थे।लेकिन बुद्ध को यहाँ भी शांति नहीं मिली।

इसके बाद सिद्धार्थ राजगृह आये। यहाँ पर आचार्य रुद्रकरामपुत्त थे। यहाँ भी इन्हे संतोष नहीं मिला और यहाँ से चल दिए पास ही में ब्राह्मणी पदमा के पास पहुंचे और फिर ब्रह्मर्षि रैवत के पास पहुंचे।लेकिन इनमे से कहीं भी सिद्धार्थ को संतोष और शांति नहीं मिला। 

इसके बाद सिद्धार्थ उरुवेला(सेनापतिग्राम) में आसन लगाया। यह स्थान निरंजना नदी के तट पर है। यहाँ पर एक सोत्थिय नामक ब्राह्मण ने इनको बैठने के लिए आसन दिया। लेकिन यहाँ पर पहले से ही पांच ब्राह्मण विद्यमान थे जिनका नाम था-कौण्डिन्य,तात्प,भद्दीय,अश्वजित,महानाम। ये सभी तपस्या कर रहे थे यहॉं। यही पर उरुवेला ग्राम की मुखिया की लड़की सुजाता सिद्धार्थ के लिए खीर लेके खड़ी थी। Mahatma budh ka Jeevan parichay

ज्ञान की प्राप्ति:- 

प्रारम्भ में सिद्धार्थ कठोर तप शुरू किये जिससे उनका शरीर जर्जर अवस्था में पहुँच गया। लेकिन होना क्या था? यहीं पर पांचो ब्राह्मणो से सिद्धार्थ का तपस्या के बात को लेकर मतभेद हो गया जिससे गुस्सा कर ये ब्राह्मण सारनाथ में चले आये।सारनाथ को ऋषियों का बंदरगाह नगर कहा जाता है-ऋषिपट्टनम। Mahatma budh ka Jeevan parichay

सिद्धार्थ भी गया जिले में आये और यहीं पर आसन लगाए। ये पीपल के बृक्ष के नीचे बैठे जिसको -बोधिबृक्ष कहा जाता है।  यहाँ पर कठोर तप को त्याग दिया और मध्यम प्रतिपदा का मार्ग अपनाये और तपस्या में लीन हो गये। 

बोधिगया में ही तप के आठवें दिन इनको ज्ञान की प्राप्ति हो गयी और ये  जीवन सम्बन्धी सभी तथ्यों को जान लिए इसी लिए ये तथागत कह लाये।बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति छः वर्षों की कठिन तपस्या के बाद ही ३५ वर्ष की अवश्था में हुई थी।  जब इनको दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई तो ये बुद्ध कह लाये।वैशाख पूर्णिमा  के दिन ही इनको ज्ञान की प्राप्ति हुई इसलिए इस दिन को बुद्ध पूर्णिमा भी कहा गया है और बुद्ध के ज्ञान को सम्बोधि कहा गया है। Mahatma budh ka Jeevan parichay

अब महात्मा बुद्ध पूरी तरह से जीवन के सभी रहस्य को अच्छे से जान लिया था।अब वो ज्ञान के पूर्णता को प्राप्त कर चुके थे और इस ज्ञान को संसार के कोने कोने तक पहुँचाना चाहते थे।वे निकल पड़े संसार को शिक्षा देने के लिए।

बुद्ध का प्रथम उपदेश:-

तपस्सु और भल्लिय नामक दो चरवाहे इनके अनुयायी हुए। इसके बाद बुद्ध सारनाथ(ऋषिपत्तनम) में पहुंचे। यहीं मृगदावन वन था। यहीं पर बुद्ध ने पांचो ब्राह्मणों को उपदेश दिया। इस प्रथम उपदेश को ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा गया है।ये इनका उपदेश मुख्य रूप से ‘चार आर्य सत्य’ के रूप में जाना जाता है।उपदेश का मूल तत्व दुःख, दुःख के कारण और उसके निवारण से था। 

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बौद्ध धर्म का प्रचार :-

अपने प्रथम उपदेश के बाद ये पाँचो ब्राह्मणों को लेकर वाराणसी आ गए और बुद्ध ने अपना प्रथम वर्षाकाल यहीं बिताया। और यहीं पर  यश नामक व्यापारी अपने ६० सदस्यों के साथ दीक्षित हुआ बुद्ध के द्वारा। Mahatma budh ka Jeevan parichay

बुद्ध जब राजगृह जा रहे थे तो रास्ते में उरुवेला में वे रुके। यहीं पर जटिलक संप्रदाय के तीन भाई-मुख्य कश्यप,नदी कश्यप,गया कश्यप बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए। Mahatma budh ka Jeevan parichay

बुद्ध ने वाराणसी में ही अपना मठ बनाने का फैसला किये और कहा की “दो लोग एक साथ एक दिशा में मत जाओ” 

इसके बाद बुद्ध राजगृह आये और यहाँ के राजा थे बिम्बिसार। राजा बिम्बिसार बुद्ध के प्रति काफी श्रद्धा रखते थे और उन्होंने इनके लिए ‘बेलुवन विहार’ वनवाया ताकि बुद्ध वर्षा काल में यहाँ रह सकें।सबसे बड़ी बात तो यह है की बुद्ध यहाँ पर अपना दूसरा,तीसरा,चौथा वर्षाकाल व्यतीत किया। Mahatma budh ka Jeevan parichay

राजगृह में ही महात्मा बुद्ध ने संजय और उनके दो शिष्यों -सारीपुत्र और मौदगल्यान को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया।इसके बाद बुद्ध कपिलवस्तु पहुंचे और अपने पुत्र राहुल और नन्द जो गौतमी प्रजापति का पुत्र था दोनों को बौद्ध धर्म में दीक्षित किये।महात्मा बुद्ध ने यहाँ पर एक कठोर नियम की घोषणा कर दिए कि “कोई भी अपने माता पिता के अनुमति के बिना सन्यास नहीं बन सकता।” और यहीं पर अपने पिता शुद्धोधन को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया।

इसके बाद मित्रों बुद्ध चले गए अनुपिय नामक स्थान पर जहाँ वे आनंद,उपालि,नापित,और अपने चचेरे भाई देवदत्त को दीक्षित किये। लेकिन सोचने वाली बात तो यह है की देवदत्त बुद्ध का बहुत बड़ा विरोधी था और इसने तो इनके ऊपर तीन बार हमला भी किया था। 

बुद्ध ने आनंद को अपना व्यक्तिगत सेवक ही बना लिया और ये इनके प्रिय शिष्यों में से एक थे। इसके पश्ताच ये फिर राजगृह आ गए और यहीं पर श्रावस्ती का व्यापारी अनाथपिंडक बुद्ध से मिलने के लिए आया। यहाँ पर बुध ने अनाथपिंडक को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया और इसने बुद्ध को जेतवन नामक विहार बुद्ध को दिया। ये विहार अनाथपिंडक ने राजकुमार जेत से ख़रीदा था। 

अब राजगृह से बुद्ध वैशाली पहुंचे और अपना यहीं पर पाँचवा वर्षाकाल व्यतीत किया। लिच्छवियों ने कुटाग्रशाला का निर्माण कर बुद्ध को प्रदान किया। Mahatma budh ka Jeevan parichay

वैशाली से बुद्ध कपिलवस्तु पहुंचे जहाँ पर उनको अपने पिता के मृत्यु का समाचार मिला। इसके बाद वो प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर पहली बार वैशाली में ही गौतमी प्रजापति को अपने संघ में शामिल किया और स्त्रियों के लिए मठ की स्थापना किये जिसमे प्रजापति शामिल होने वाली पहली महिला थी।Mahatma budh ka Jeevan parichay

चूलवग्ग जातक में ये लिखा मिलता है की बुद्ध ने कहा की “जो मेरा संघ १०००  वर्ष तक जीवित रहता वो अब ५०० वर्ष तक ही जीवित रहेगा। 

वैशाली में ही श्रावस्ती के श्रेष्ठि भिगार की पुत्रवधु विशाखा बौद्ध धर्म में दीक्षित हुई।विशाखा ने कौशल के राजा प्रसेनजित से एक भूखंड ख़रीदा और वहां पर पूर्वाराम विहार वनवाया और बुद्ध को समर्पित कर दिया।

इसके बाद प्रसेनजित की रानी मल्लिका भी बौद्ध धर्म में दीक्षित हुई। ये माली की लड़की थीं। इन्होने बुद्ध को मालिकराम बिहार दिया था। बड़े पैमाने पर लोग बौद्ध धर्म में दीक्षित हो रहे थे। Mahatma budh ka Jeevan parichay

इसके बाद बिम्बिसार की रानी क्षेमा,कोलिय गणराज्य की कन्या सुप्रवासा भी बौद्ध  दीक्षित हुईं। और तो और वैशाली की नगर वधु आम्रपाली भी बौद्ध धर्म में दीक्षित हुई। इन्होने आम्रवाटिका ही बुद्ध को समर्पित कर दिया। बुद्ध का छठवाँ वर्षाकाल मनकुलगिरि में बिता और सातवां वर्षाकाल तवंतिसलोक में बिता था। Mahatma budh ka Jeevan parichay

इसके बाद भग्गों की राजधानी सुमसुमारगिरी(मिर्ज़ापुर)में बुद्ध आये और यहाँ के शाशक बोधिस कुमार को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। यहाँ पर इनका आठवां वर्षाकाल बिता था। 

बुद्ध ने अपना नौवां वर्षाकाल कौशाम्बी में बिताया। यहाँ पर शाशक उद्ययन विद्यमान थे। लेकिन पिण्डोला भरद्वाज ने उदयन को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था।आप लोग एक बात हमेशा ध्यान में रखियेगा की बुध ने अवन्ति में आप कोई उपदेश नहीं दिया था।यहाँ पर उन्होंने अपने शिष्य महाकच्चायन को भेजा था। इन्होने यहाँ के राजा चण्डप्रद्योत को दीक्षित किया था। 

इनका दसवां वर्षाकाल पारिलेच में और ११ वां वर्षाकाल नलग्राम में और १९वां वर्षाकाल राजगृह में बीता। इसके बाद इनका सारा काल श्रावस्ती में ही बिताये।बौद्ध धर्म का सबसे अधिक प्रचार कौशल राज्य में हुआ।  

बुद्ध का निवास क्रम था-श्रावस्ती⇔राजगृह⇔ वैशाली ⇔कपिलवस्तु।

महात्मा बुद्ध और अंगुली माल 

जब महात्मा बुद्ध और अंगुली मॉल का मुलाकात हुआ तो उसने बुद्ध को कई से धमकाने की कोशिस किया और कहा की मैं लोगो को मार कर उनकी अंगुली काट कर उसका माला पहनता हूँ। लेकिन बुद्ध विचलित नहीं हुए और उसको ज्ञान दिए की तुम जितना हिंसा करोगे तुम्हें उतनी ही अशांति मिलेगी और कभी खुश नहीं रह पाओगे।शांति चाहिए तो ये सब काम छोड़ कर अपने को शुद्ध कर लो। 

जब अंगुली माल थोड़े देर बुद्ध को देखता रहा और उपदेश सुनता रहा तो उसने बुद्ध को कहा की आप को मुझसे डर नहीं लगता तो उन्होंने कहा की डर तो उसको लगता है जो गलत काम करता है मुझे किस बात का डर? अब अंगुली माल बुद्ध के प्रभाव में पूरी तरह आ चूका था और खुद को समर्पित कर दिया और उनका अनुयायी बना। Mahatma budh ka Jeevan parichay

यहाँ सबसे बड़ी बात ध्यान रखने की है कि बुद्ध के सबसे अधिक अनुयायी श्रावस्ती में बने थे और यहीं पर डाकू अंगुलिमाल दीक्षित हुआ था।

इसके बाद बुद्ध पावा के मल्लो के पास पहुंचे। पावा यानि की पडरौना। यह मल्लों की राजधानी थी। यहीं पर बुद्ध एक कर्मार यानि की लुहार चुन्द के घर पर रुके।बुद्ध ने यहाँ सुकर मद्दव(सूअर का मांस) खा लिया। इसके बाद बुद्ध के पेट में भयंकर दर्द शुरू हो गया। अब होना क्या था नियति को यही मंजूर था। 

बुद्ध का अंतिम उपदेश और शिष्य 

अब बुद्ध हिरण्यवती नदी को पार किये और कुशीनगर पहुँच गए और शालवन में जाकर लेट गए।आपको मालूम होना चाहिए की बुद्ध ने अपना अंतिम उपदेश यहीं पर सुभद्र को दिया। ये इनका अंतिम उपदेश और शिष्य था। 

इन्होने सुभद्र को कहा की  “सभी सांघातिक वस्तुओं का विनाश स्वयं होता है अपनी मुक्ति के लिए स्वयं प्रयास करो और मेरे धर्म और विनय संबधी नियम ही तुम्हारा रास्ता होगा।”

बुद्ध की मृत्यु 

४८७ ईस्वी पूर्व के लगभग गौतम बुध की ८० साल के उम्र में मृत्यु हो गयी और बौद्ध ग्रंथो में इस घटना को महा परिनिर्वाण कहा गया है।

लेकिन इसके बाद बुद्ध की अस्थियों को लेकर काफी विवाद उत्पन्न हो गया और इनकी अस्थियो को आठ लोगों ने लिया। 

  1. मगध के राजा अजातशत्रु 
  2. वैशाली के लिक्षवी 
  3.  कपिल वास्तु के शाक्य
  4. अलकप्प के बुली 
  5. राम गाम के कोलिय 
  6. वेठद्वीप के ब्राह्मण
  7. पावा के मल्ल
  8. पिप्पली वन के मोलिय
बुद्ध का वर्षाकाल निवास क्रम :-वाराणसी सारनाथ ⇔राजगृह⇔वैशाली ⇔मनकुलगिरि ⇔तवंतिसलोक ⇔सुंसुमारगिरि ⇔कौशाम्बी ⇔पारिलेच ⇔नलग्राम⇔राजगृह ⇔श्रावस्ती

सफलता का राज :-

बुद्ध की उपस्थिति में ही इनका धर्म पूर्व में चंपा से लेकर पश्चिम में अवन्ति तक और उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में मगध तक हो गया था।इनका धर्म बहुत तेजी से फ़ैल रहा था जिसकी सफलता के पीछे इनका ज्ञान,आकर्षक और महान व्यक्तित्व मुख्य रूप से उत्तर दायी था। इसके आलावा इन्होने अपने धर्म के प्रचार के लिए व्यापक भ्रमण किया और इनके उपदेश बहुत ही व्यावहारिक और सरल होते थे और इसके साथ ही अमीर,गरीब और जातिरहित लोगों के लिए दरवाजे हमेशा खुले रहते थे।

इन्होने अपने धर्म के प्रचार के लिए जन साधारण की भाषा प्राकृत को अपनाया।इन्होने अपने धर्म को प्राकृत रूप से फ़ैलाने की कोशिश किये और किसी पर जोर जबरदस्ती नहीं डाले की मेरे धर्म में तुम आ जाओ। जो भी इनके धर्म में प्रवेश किया वो खुले दिल से किया। नेचुरल रूप में किया इसलिए आज भी लोग इनके धर्म को बड़ी सहजता से स्वीकार करते हैं और आज भी लोग इनको पूजते हैं। इनका मध्यम मार्ग का सिद्धांत तो लोगों के दिलो दिमाग पर छाया हुआ था।  

FAQ

प्रश्न:- जब महात्मा बुद्ध ने घर छोड़ा तो उनके सबसे पहले गुरु कौन बने? 

उत्तर:-जब महात्मा बुद्ध ने घर छोड़ा तो वे सबसे पहले वैशाली के समीप आलारकलाम के आश्रम में गये।ये सांख्य दर्शन के गुरु थे।  

प्रश्न:-महात्मा बुद्ध के गृह त्याग का प्रतिक क्या था? 

उत्तर:-महात्मा बुद्ध के गृह त्याग का प्रतिक अश्व था।

प्रश्न:महात्मा बुद्ध के समय जनपदों की संख्या कितनी थी? 

उत्तर:इनके समय में जनपदों की संख्या कुल १६ थी इसका स्पष्ट उल्लेख बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय में स्पष्ट रूप से मिलता है। 

प्रश्न:-किन दो ब्राम्हणो ने भविष्यवाणी किया था की ये या तो सन्यासी बनेगें या राजा?

उत्तर:-कौंडिय और काल देव नामक ब्राह्मण ने 

प्रश्न:-बौद्ध धर्म में बुद्ध के गृह त्याग को क्या कहा जाता है?

उत्तर:-ज्ञान प्राप्ति के लिए जब सिद्धार्थ घर छोड़े या गृह त्याग किये उसी को बौद्ध धर्म में महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। 

प्रश्न:-बुद्ध का प्रथम वर्षा काल कहाँ बीता था?

उत्तर:-इनका प्रथम वर्षा काल सारनाथ में बीता था। 

प्रश्न:-बुद्ध के सबसे ज्यादा अनुयायी कहाँ बने थे?

उत्तर:-यहाँ सबसे बड़ी बात ध्यान रखने की है कि बुद्ध के सबसे अधिक अनुयायी श्रावस्ती में बने थे और यहीं पर डाकू अंगुलिमाल दीक्षित हुआ था।

प्रश्न:-पूर्वाराम विहार किसने दान दिया था?

उत्तर:-विशाखा ने कौशल के राजा प्रसेनजित से एक भूखंड ख़रीदा और वहां पर पूर्वाराम विहार वनवाया और बुद्ध को समर्पित कर दिया।

प्रश्न:-बुद्ध का निवास क्रम क्या था?

उत्तर:-बुद्ध का निवास क्रम था-श्रावस्ती⇔राजगृह⇔ वैशाली ⇔कपिलवस्तु

प्रश्न:-बुद्ध की मृत्यु कब हुई थी?

उत्तर:-४८७ ईस्वी पूर्व के लगभग गौतम बुध की ८० साल के उम्र में मृत्यु हो गयी और बौद्ध ग्रंथो में इस घटना को महा परिनिर्वाण कहा गया है।

प्रश्न:-बुद्ध के सबसे प्रिय सेवक और शिष्य कौन थे? 

उत्तर:-बुद्ध ने आनंद को अपना व्यक्तिगत सेवक ही बना लिया और ये इनके प्रिय शिष्यों में से एक थे।

प्रश्न:-बौद्ध संघ में पहली महिला कौन दीक्षित हुई थीं? 

उत्तर:-प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर पहली बार वैशाली में ही गौतमी प्रजापति को अपने संघ में शामिल किया और स्त्रियों के लिए मठ की स्थापना किये जिसमे प्रजापति शामिल होने वाली पहली महिला थी।

प्रश्न:-अवन्ति के राजा उद्ययन को बुद्ध ने किसे दीक्षित करने के लिए भेजा था?

उत्तर:-आप लोग एक बात हमेशा ध्यान में रखियेगा की बुध ने अवन्ति में आप कोई उपदेश नहीं दिया था।यहाँ पर उन्होंने अपने शिष्य महाकच्चायन को भेजा था। इन्होने यहाँ के राजा चण्डप्रद्योत को दीक्षित किया था। 

प्रश्न:-सबसे ज्यादा अनुयायी बुद्ध के कहाँ बने थे? 

उत्तर:-यहाँ सबसे बड़ी बात ध्यान रखने की है कि बुद्ध के सबसे अधिक अनुयायी श्रावस्ती में बने थे और यहीं पर डाकू अंगुलिमाल दीक्षित हुआ था।

  


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